मुझे याद है जब बचपन में नदी की ओर जाना होता था, शायद स्नान आदि करने के लिए, तो पानी की धारा से थोड़ा हटकर गीली रेत हटाकर गड्ढा करते थे, ताकि स्वच्छ पानी का रिसाव होने लगे।इसमें थोड़ा वक्त तो लगता था परन्तु स्वच्छ जल पीने लायक़ मिल जाता था। स्वच्छता इस बात पर निर्भर करती थी कि वह गड्ढा मुख्य धारा से कितनी अधिक दूर कितना ज़्यादा गहरा गड्ढा किया गया था।

इसी प्रकार ध्यान की व्याख्या की जा सकती है।अर्थात् मुख्य जीवन धारा से हटकर, अपने अन्दर चल रहे अनेकानेक रेत रूपी विचारों को हटाने का प्रयास करते हुए विचार शून्यता रूपी गड्ढा खोदा जाय तो स्वच्छ ज्ञान का प्रवाह होता है।