प्रचंड बहुमत सा ब्रह्मास्त्र,
यह मत नहीं, गांडीव है अर्जुन का।
चढ़ी जो इसकी प्रत्यन्चा
शोर नहीं दहाड़ है इसकी गर्जन का।
गौरवशाली भारत देश हमारा,
पुरुषार्थी भरत, चन्द्गुगुप्त, अशोक सम्राट,
विश्वामित्र, वशिष्ठ, व्यास,
चाणक्य जैसे व्यक्तित्व विराट।
पता ही नहीं चला मूल्यों में ह्रास,
कैसे हमारे अंतस् को भिंगा गया।
इसे निचोड़कर अलग करना था,
पर दुर्भाग्यवश इसे ही सींचा गया।
नीचे से उपर ईमानदार जाता है
और उपर से नीचे ईमानदारी आती है।
सत्तर साल लगे यही समझने में,
कि कष्ट झेलकर ही समझदारी आती है।
जो धृष्ट, भ्रष्ट, कष्टकारक हैं,
न्याय उन्हें भी आज देनी है।
जेलों को सुधार गृह में तब्दील कर,
उन्हें देश प्रेम की पाठ पढ़ानी है।
लेकर साथ सबका विकाश करना है,
जीतकर विश्वास नया भारत बनाना है।
उल्टे घोड़ों को सीधा कर सरपट दौड़ लगाना है,
महाशक्ति बने भारत, विश्वगुरु बिगुल बजाना है।
प्रचंड बहुमत सा ब्रह्मास्त्र,
यह मत नहीं, गांडीव है अर्जुन का।
चढ़ी जो इसकी प्रत्यन्चा
शोर नहीं दहाड़ है इसकी गर्जन का।
चौहद्दियों को पहले ठीक करें,
पड़ोसियों को करें निर्भय,
मगरूरों को मगर मक्कारी की सजा,
देकर देश को करें दुर्जय।
कुपोषण, भुखमरी और ग़रीबी
बीमारी, बेरोज़गारी कलंक है।
अशिक्षा, अस्पृश्यता, साम्प्रदायिकता,
घृणा आदि सब षडयंत्र है।
कोई ज्ञानी है, तो कहीं ऊर्जा से भरपूर जवानी है,
कहीं कुबेर का ख़ज़ाना है, तो कहीं तकनीक है पैमाना।
आवाहन है आप सब का, करने को सृजन,
नित नए आविष्कारों का, कि देश बना रहे मर्दाना।
ये हीरों का हार, विशाल अट्टालिकाएँ,
ख़ूबसूरत तन, धन और सम्पन्नता।
पर याद वही रहेगा, जिसने जिया है,
देश के लिए, दूर की है विपन्नता ।
प्रचंड बहुमत सा ब्रह्मास्त्र,
यह मत नहीं, गांडीव है अर्जुन का।
चढ़ी जो इसकी प्रत्यन्चा
शोर नहीं दहाड़ है इसकी गर्जन का।
प्रणाली ऐसी बनाएँ,
सबको क़ानून का भय हो।
सहयोग, सद् वृत्ति, सच्चाई
अपनाने वालों की जय हो।
सजा मिले दुष्टों को, सज्जनों को ईनाम,
स्वतंत्र होकर करें पूरे निज अरमान।
सम्मान योग्यता की हो, यहाँ
अवसर हो सबके लिए समान।
इंकार किसी को न्याय से नहीं,
यही ज़िम्मा हर बार है।
कर सको तो सरकार है,
वरणा आपकी क्या दरकार है।
धवल, सुन्दर, मनोरम
मुकुट शोभित शीश पर,
लाल लथपथ लहु से
कश्मीर भारत के शीर्ष पर।
शांति हो अमन हो यहाँ ,
कोशिशें हो रही हर पल ।
पर फूल देने वाले हाथों को,
पत्थर थमा, मचाया हलचल।
कुछ मुट्ठी भर लोगों को
देश अपना, बेगाना लगता है।
भड़काते बच्चों को बहलाकर,
रोज़ सुरक्षा में सेंध करता है।
पर न्याय रहित देश हो सकता नहीं,
कबीले की संस्कृति से नाता नहीं।
तम है फैला, आतंकी मन से जाता नहीं,
उठा गांडीव, इनसे अब कोई बाता नहीं।
न्याय के लिए उठे गांडीव, तांडव को तत्पर,
खींचकर प्रत्यंचा इसकी घनघोर टंकार करे।
ऐसे कि चंचल चोर भ्रष्ट चिंतन से भी डरे,
थर-थर काँपे दुष्ट जन, सज्जनों के भंडार भरे।
यह सुभाष, भगत, अशफाकउल्ला
जैसे वीरों का तर्पण है।
गांधी, पटेल, शास्त्री जैसे
सपूतों का दर्पण है।t
अर्जुन जैसे हमारा प्रधान,
सौंपा है गांडीव आपको श्रीमान ।
हम आम जनों के आशा की किरण
अक्षुण्ण रहे हमारा सम्मान ।
प्रचंड बहुमत सा ब्रह्मास्त्र,
यह मत नहीं, गांडीव है अर्जुन का।
चढ़ी जो इसकी प्रत्यन्चा
शोर नहीं दहाड़ है इसकी गर्जन का।



