होरी और कोरोना

आज जब होरी बिस्तर से ना उठा,
चढ़ आसमान में सूरज दक्खिन में जा झुका
बाँट जोहती रही निबौरी आँगन की
पर कोई डाली दातुन का भी न टूटा।
वर्षों बीत गए, गोरैया अब आती नहीं,
दिन चढ़ आया पर कोई कलरव मचाती नहीं।
मशीन चलते नहीं, आदमी निकलते नहीं,
शान्ति है पसरी पड़ी, धनिया भुनभुनाती रहीं।
बंद हो गया है, लोगों का आना-जाना,
था कभी हुक्का-पानी इस का बहाना।
जब से आया है, दुनियाँ में अदृश्य कोरोना,
घरों में बंद हो गए सब अपना- अपना।
अरे उठे काहे नहीं, कितनी नींद आती है,
दूर से ही धनिया बस चिल्लाती है।
धोकर गोबर से सना हाथ, झल्लाती है,
निकालती दुध एक हाथ से, दूसरे से बछड़े को दूर भगाती है।
फ़ुरसत से बैठकर आँगन के एक कोने में
‘उसका इकलौता लाल गोबर कहाँ फँसा होगा,’
पर इत्मिनान से बुदबुदा रही, सरकारें खिला रही,
वह भी वहीं कहीं रुका होगा।
अब कोई नहीं घर से निकलता बेधड़क,
सुनसान पड़े हैं नगर के सारे सड़क ।
कोई इक्का- दुक्का मनचला जो निकल चला,
रुकते नहीं पुलिसिया डंडे, पड़ते तड़क-तड़क।
धनिया सोच रही थी, लॉक-डाउन कब तक रहेगा,
हाथ धो-धो कर थक गई, साबुन भी कब तक चलेगा।
राशन की तो कमी नहीं, खेतों में शाक- सब्ज़ी भरे पड़े,
दो कपड़ों में काम चल जायेगा,पर नून तेल कौन लेकर आएगा।
अरे ऐसे कोई सो जाता है,
जैसे कोई मर जाता है।
माना कोई बाहर नहीं जाता है,
घर में रहकर भी कुछ करता है।
गोबर का दिया यह मोबाइल, रात भर बोलता रहा,
ख़ूब समाचार सुनाता रहा, इसीलिए देर तक सोता रहा।
होरी बोलता रहा, धनिया को समझाता रहा,
चमगादड़ खाकर चाइना, कोरोना वाइरस फैलाता रहा।
पर तुम क्यों चिंतित होती हो भाग्यवान,
सभी सरकारें हैं चौकस, कर रहीं इसका निदान।
बाहर मत निकलो, निकलो तो छह फ़ीट की परस्पर दूरी मान,
घोर विपदा की स्थिति में लोगों ने भी किया है भरपूर दान।
अपराधी कोरोना है खुला घूम रहा,
और हम मुँह छुपाए घरों में क़ैद पड़े हैं।
अवरुद्ध हुआ सड़क, रेल और हवाई मार्ग,
बंद हुआ कल-कारख़ाने, सड़कों पर सिपाही खड़े हैं।
नमक का महत्व आज हमने जाना है,
सोना, चाँदी और तेल को पहचाना है।
ज़िंदगी की परिभाषा उल्टी हो गई, हमने माना है,
न हाथ मिलाओ, न गले लगाओ, सबसे दूर रहना है।
हम कोरोना चेन को भंग करेंगे,
दूर रह कर इसको वहीं बंद करेंगे।
मान कर प्रिय प्रधान मंत्री की हिदायतें
उत्तरदायी बनकर हिम्मत बुलंद करेंगे।
यह वाइरस नहीं चेतावनी है,
आगे स्थिति और डरावनी है।
प्रदूषण से पिघल रहे हैं ग्लेशियर
वाइरस और भी अभी आनी है।
सामने खड़े शत्रु का बाली आधा बल हर लेते थे,
स्वयं भगवान छिपकर ही बाली से रण जीते थे।
अदृश्य कोरोना वाइरस भी बेजोड़ छली है,
जबसे चली है, निरन्तर ख़ौफ़ फैलाती महाबली है।
यह नहीं समय उचित, उसे तो इच्छा मृत्यु आएगी।
अभी मरे तो कोरोना विजयी कहलाएगी,
कोई कुटुम्ब या कोई जनता नहीं आएगी,
बोला होरी बस हमें तो पुलिस ही दफ़नाएँगी।







