स्वर्ग कहाँ है…….

स्वर्ग एक अलग जहां है?

किसी ने क्यू फैलाया, स्वर्ग एक अलग जहाँ है।
प्रमाण क्या है, नहीं है यह स्वर्ग, रहते हम जहाँ है।
कोई बर्फ से भी ठंडा, कोई अंगारे की तरह धधक रहा।
शीतल छाँव, जरूरत भर गर्मी, ये सब और कहाँ है….

धरती पर नहीं स्वर्ग, फिर ये कहाँ है?
किसी ने क्यू फैलाया, स्वर्ग एक अलग जहां है।

रहते जहाँ नर- नारी, सुंदर उपवन, मीठे फल
चलती सीढ़ी, उड़ता जहाज, ऐसा ठौर और कहाँ है।
रहता कोई अपना, सात समंदर पार,
बातें करता, जब चाहे सामने आता,
ऐसी विधा और कहाँ है।

यह भव्य भू—मण्डल, लहराता सागर,
कल-कल करती नदियाँ, पंख फैलाती चिड़ियाँ,
सूरज-चाँद रोशनी फैलाते, वह सत रंगी दुनियाँ बस यहाँ है।

जल, थल, वायु, उष्मा और प्रकाश
स्वत: सब उपलब्ध यहाँ, धरती और आकाश।
है इंद्रधनुषी छटा चारों ओर,
मीठे जल बरसाता घन घटा घनघोर।

चर, अचर, जलचर सबमे श्रेष्ठ नर है।
सांसारिक संसाधनोंके स्वामी,
शेष सभी आपका अनुचर है।
हे वसुंधरा के सर्वश्रेष्ट, तू ही सबसे ऊपर है।

धरती पर नहीं स्वर्ग, फिर ये कहाँ है?
किसी ने क्यू फैलाया, स्वर्ग एक अलग जहां है।

ज्ञान विज्ञान के पंडित, पराक्रमी शूरवीर,
कहीं करनी है रफ्तार तेज़, कहीं धीरज धर अधीर।
हम लौट सकें फिर, इतना चल अमीर,
सहेज कर कुछ पल, श्रेष्ठ करें जमीर।

छेड़नी है संग्राम, कि हो न सके गंदा,
अब और, जल, जंगल और जमीन।
वृक्ष ही बुनियाद है, बचा लो मीठा नीर,
पर्यावरण के हित में सबको करें शामिल।

कुछ कचरा कम करें, कुछ की करें विदाई।
एकल प्रयोग प्लास्टिक, बंद करो मेरे भाई।
रसोई में गैस का चलन स्वीकार करें,
धूल-धुएँ वाले ईधन अस्वीकार करें।

जल-जीवन है, रोको इसे, मत बह जाने दो,
बनाकर गड्ढा, एक छोटा, जमीन में समाने दो।
दिन से रोशनी कर्ज लेकर, रात को उधार दे दो।
बिजली की करें बचत, पर्यावरण को सुधार दे दो।

धरती हमारी जो लगती इतनी विशाल है।,
लटकी है अन्तरिक्ष में बिन्दु सम, कमाल है।
उगता मानव फसल यहाँ, करता धमाल है,
हमारा ही आविष्कार, आज दुश्मन विकराल है।

धरती पर नहीं स्वर्ग, फिर ये कहाँ है?
किसी ने क्यू फैलाया, स्वर्ग एक अलग जहां है।

एक प्लास्टिक की थैली में,
कल एक किलो सेब आया था,
किसी ने थैली को तुच्छ समझ
सामने सड़क पर फेंक आया था।

तभी तो वहाँ कूड़े का अम्बार है,
उसमे प्लास्टिक का भरमार है।
हवा के झूले में बैठकर ये तुच्छ
चहुंओर फैल रहा हर बार हैं।

खेतों में पहुँचकर उर्वरा को,
और जल को रोका हैं नालों में,
जिंदगी जानवरों का भी तबाह हुआ,
प्लास्टिक मिला कंकालों में।

बाढ़ बवंडर को बल मिला,
तबाह हुए गाँव –शहर समेत,
तिनके की तरह बह चले,
भारी भरकम सामान अनेक।

अन्तरिक्ष से देखा, चश्मे का ये शहर,
जहां उड़ता बादल, अभी तो बरसाता जल है।
बस बीमार हो चला हैं,
ले शपथ सेवा का, एक मात्र यही हल है।

धरती पर नहीं स्वर्ग, फिर ये कहाँ है?
किसी ने क्यू फैलाया, स्वर्ग एक अलग जहां है।

वसुंधरा ही अन्नदाता, कामधेनु समंदर,
पशु, पक्षी, जलचर सब यहाँ हैं,
अमृत है जल, पेंडो से प्राण है,

धरती पर नहीं स्वर्ग, फिर ये कहाँ है?
किसी ने क्यू फैलाया, स्वर्ग एक अलग जहां है।